क्या आप स्त्री रोग संबंधी समस्याओं से परेशान है?


पीसीओडी (PCOD/PMOS)

अनियमित पीरियड्स

यूटेराइन फाइब्रॉयड
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स्त्रीरोग संबंधी प्रमुख समस्याएँ
कई स्त्रीरोग संबंधी समस्याएँ हैं जो प्रजनन (रिप्रोडक्टिव) आयु की महिलाओं को अक्सर प्रभावित करती हैं। ये इन समस्याओं से महिलाओं के मनोवैज्ञानिक और हार्मोनल स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है और उन्हें चिड़चिड़ा बना सकती हैं। लेकिन इनमें से ज़्यादातर बीमारियों को जीवनशैली में सही बदलाव और सही होम्योपैथी इलाज से प्रभावी रूप से मैनेज किया जा सकता है।
कुछ सबसे ज्यादा होने वाली स्त्रीरोग सम्बन्धी समस्याएं हैं:
1. मासिक धर्म में अनियमितता (Irregular Menses)
मासिक धर्म की अनियमितता महिलाओं में होने वाली सबसे आम समस्याओं में से एक है। यह एक ऐसी कंडीशन है जिसमें पीरियड्स अपने नियत समय पे न आ के कभी बहुत पहले आ जाता है कभी बहुत देर में, या महीने में एक से ज़्यादा बार आ सकता है। या कभी कभी कई कई महीनों तक नहीं आता। स्राव भी कभी सामान्य से काम या ज़्यादा हो सकता है। कभी कभी बिना पीरियड्स के ही बीच में स्पॉटिंग भी हो सकती है।
2. पीसीओडी (PCOS/PMOS)
पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS), जिसे पहले पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (PCOS) कहा जाता था, एक ऐसी कंडीशन है जिसमें महिलाओं में हॉर्मोन का असंतुलन हो जाता है। इससे पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं और अंडाशय (ओवरी) में सिस्ट जैसी संरचना बन सकती हैं। PMOS की वजह से महिलाओं के अंदर पुरुषों में पाए जाने वाले मेल सेक्स हार्मोन का स्तर भी बढ़ जाता है, जिससे स्त्रियों के चेहरे पर अनचाहे बाल ज़्यादा आ जाते हैं। इस हार्मोनल असंतुलन से चेहरे पर मुंहासे होना और शरीर का वज़न भी बढ़ता है। PMOS की वजह से अक्सर महिलाओं को गर्भ धारण करने में कठिनाई भी होती है।
3. गर्भाशय में रसौली (यूटेराइन फाइब्रॉएड)
गर्भाशय में रसौली (यूटेराइन फाइब्रॉइड) गर्भाशय की मांसपेशियो में होने वाली एक असामान्य ग्रोथ है जो गर्भाशय की दीवार, गर्भाशय की कैविटी या गर्भाशय की बाहरी सतह पर हो सकती है। ज़्यादातर मामलों में, यह एक बिनाइन (नॉन-कैंसरस) ग्रोथ होती है। जब रसौली छोटी होती हैं, तो वो कोई लक्षण पैदा नहीं करते हैं, लेकिन जैसे-जैसे यह बढ़ती हैं, वैसे वैसे पीरियड्स में ज़्यादा ब्लीडिंग, पीठ दर्द और समागम के दौरान दर्द पैदा कर सकती है। रसौली महिलाओं में अधिकतर उस उम्र में होती है जब उन्हें सक्रिय माहवारी आ रही होती है।
4. गर्भाशय का पॉलीप (यूटेराइन पॉलीप)
यूटेराइन पॉलीप उंगली के आकार वाली एक उभारनुमा संरचना है जो बच्चेदानी की अंदरूनी परत पर बनती है। यह एक अकेली संरचना के रूप में या समूह में बन सकती है। यूटेराइन पॉलीप ज़्यादातर उस उम्र में बनती है जब महिलाओं में मासिक धर्म के बंद होने की अवस्था चल रही होती है। लेकिन कभी कभी यह शुरुआती रिप्रोडक्टिव सालों में भी बन सकती है, खासकर उन महिलाओं में जो हार्मोन के असंतुलन से पीड़ित हैं। कुछ दुर्लभ मामलों में, यूटेराइन पॉलीप मैलिग्नेंट(घातक) हो सकती है और इसकी सही जांच होना जरूरी है।
5. वजाइनल (योनि सम्बन्धी) समस्याएं
महिलाओं में वजाइनल समस्याएं आम हैं, कुछ अक्सर होने वाली समस्याएं हैं :
- वजाइनल इन्फेक्शन जैसे यीस्ट इन्फेक्शन, या बैक्टीरियल इन्फेक्शन।
- समागम के दौरान सूखापन, जलन और दर्द।
- मूत्र मार्ग का संक्रमण(UTI / यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन)।
- कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस (संपर्क त्वचाशोथ) इत्यादि।
6. फर्टिलिटी (प्रजनन सम्बन्धी) समस्याएं
इनफर्टिलिटी दो तरह की हो सकती है प्राइमरी या सेकेंडरी:
प्राइमरी इनफर्टिलिटी: महिला पहले कभी गर्भवती न हुई हो और अगर उसकी उम्र 35 साल से कम हो और वो एक साल तक प्रयास करने के बाद भी गर्भवती ना हो पा रही हो, या महिला की उम्र 35 साल से ज्यादा हो और 6 माह से अधिक समय से प्रयास करने के बावजूद वह गर्भ धारण करने में असक्षम हो तब यह प्राइमरी इनफर्टिलिटी कहलाती है।
सेकंडरी इनफर्टिलिटी: जब कोई महिला पहले कम से कम एक बार गर्भवती हो चुकी हों लेकिन दोबारा गर्भधारण नहीं कर पा रही हो तब यह सेकंडरी इनफर्टिलिटी कहलाती है।
इनफर्टिलिटी के कई कारण हो सकते हैं; इसकी सही जांच ज़रूरी है।




